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पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच रूस के राष्ट्रपति का भारत दौरा, जानिए क्या-क्या हो सकते हैं समझौते

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Written by
Amit Anand

 नई दिल्ली।
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन गुरुवार से दो दिन के दौरे पर भारत आ रहे हैं। यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद उनका यह पहला भारत दौरा है। वे यहां 23वें भारत-रूस सालाना सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। दौरे की शुरूआत से पहले मॉस्को में एक इन्वेस्टमेंट फोरम में पुतिन ने कहा कि ऊर्जा, इंडस्ट्री, अंतरिक्ष, कृषि और दूसरे सेक्टर में कई साझा प्रोजेक्ट के जरिए नई दिल्ली के साथ रिश्तों को बेहतर बनाया जाएगा

पुतिन के दौरे की टाइमिंग बेहद नाज़ुक कही जा सकती है। भारत पर वॉशिंगटन की तरफ से रूसी तेल की खरीद बंद करने और अमेरिकी ऊर्जा तथा अन्य वस्तुओं के लिए अपना बाजार खोलने का लगातार दबाव है। फिर भी माना जा रहा है कि पुतिन के दौरे में ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत बनाने, रक्षा सप्लाई लाइन में स्थिरता लाने और पश्चिमी प्रतिबंधों के दबाव में द्विपक्षीय व्यापार जारी रखने के प्रयास होंगे।

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द्विपक्षीय संबंधों के तीन स्तंभ

थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनीशिएटिव (GTRI) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव के अनुसार, रूस के साथ भारत का मौजूदा जुड़ाव तीन स्तंभों पर टिका है – ऊर्जा, रक्षा और डिप्लोमेसी। दोनों देशों के रिश्तों में ऊर्जा सबसे ऊपर है। रूस, भारत का सबसे बड़ा क्रूड ऑयल सप्लायर बन गया है, जो भारत के कुल तेल आयात का 30–35% तक सप्लाई करता है। रक्षा दूसरा पिलर है। रूस, भारत के ज्यादातर फ्रंटलाइन प्लेटफॉर्म – फाइटर जेट, सबमरीन, टैंक और एयर डिफेंस सिस्टम – की सप्लाई और सर्विस करता है।

तीसरा पिलर BRICS, शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन और ईस्टर्न इकोनॉमिक फोरम जैसी मल्टीलेटरल बॉडी के जरिए राजनयिक समन्वय है। साथ ही परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष, उर्वरक और कनेक्टिविटी में भी दोनों देशें के बीच सहयोग है। भले ही भारत वॉशिंगटन, ब्रुसेल्स और टोक्यो के साथ रिश्ते गहरे कर रहा है, लेकिन वह मॉस्को को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता के लिए जरूरी मानता है।

एक-तिहाई कच्चा तेल आयात रूस से

यूक्रेन युद्ध के कारण रूस पर लगे प्रतिबंधों की वजह से वह भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर बन गया। वर्ष 2021 तक भारत के लिए रूस एक छोटा सप्लायर था। वहां से सालाना क्रूड आयात मुश्किल से 2–3 अरब डॉलर होता था और भारत के ऑयल बास्केट का मुश्किल से 1–2% हिस्सा था। लेकिन 2022 में यह तेजी से बदला। उस वर्ष आयात बढ़कर 25.5 अरब डॉलर हो गया और भारत के क्रूड आयात में रूस का हिस्सा बढ़कर लगभग 15% हो गया। पाबंदियों की वजह से रूस डिस्काउंट पर क्रूड बेच रहा था। अगले साल, 2023 में रूस से आयात बढ़कर 48.6 अरब डॉलर हो गया। कुल आयात में रूस का हिस्सा 34.6% था। रूस खाड़ी के पारंपरिक सप्लायर देशों से भी आगे निकल गया। वर्ष 2024 में रूस से आयात और बढ़कर 52.7 अरब डॉलर हो गया, और कुल क्रूड आयात में उसका हिस्सा 37.3% हो गया। इस तरह सिर्फ तीन साल में भारत की ऊर्जा सुरक्षा का ढांचा बदल गया।

रक्षा क्षेत्र में रूस पर बड़ी निर्भरता

रूस के साथ भारत के रक्षा संबंध दशकों पुराने और गहरे हैं। भारत के लगभग दो-तिहाई सैन्य साजो-सामान रूसी मूल के हैं। पुतिन के दौरे में भारत S-400 ट्रायम्फ सिस्टम की डिलीवरी में तेजी लाने और रूसी प्लेटफॉर्म के लिए स्पेयर पार्ट्स और अपग्रेडेशन पर बात कर सकता है। क्रेमलिन प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने कहा है कि पुतिन के दौरे में S-400 लंबी दूरी की एंटी-एयरक्राफ्ट मिसाइलों की बिक्री पर बात हो सकती है। पेसकोव ने कहा, भारतीय सेना में 36% रूसी हथियार हैं और उम्मीद है कि यह जारी रहेगा। रूस को भारत द्वारा Su-57 पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर खरीदने की संभावना पर भी चर्चा होने की उम्मीद है। न्यूक्लियर एनर्जी पर समझौते की भी संभावना है। पेसकोव के अनुसार, भारत को रूस छोटे रिएक्टर ऑफर करेगा।

रूस के साथ व्यापार में भुगतान व्यवस्था

दोनों देशों के बीच भुगतान की व्यवस्था तेजी से डी-डॉलराइज हो रही है। रूस को SWIFT से आंशिक रूप से हटाए जाने के बाद भुगतान कई करेंसी में किया जाने लगा। इसमें दिरहम (60–65%), रुपया (25–30%) और युआन (5–10%) शामिल थे। चुनिंदा भारतीय अकाउंट में भुगतान के करीब 60,000 करोड़ रुपये पड़े हैं, जिनका रूस इस्तेमाल नहीं कर पा रहा है। इसलिए रूस अब UAE दिरहम के जरिए सेटलमेंट पसंद करता है। इसे वह आसानी से खर्च या बदल सकता है। युआन का इस्तेमाल कभी-कभार ही होता है। श्रीवास्तव के अनुसार, “भारत के लिए रणनीतिक संतुलन बनाए रखने की चुनौती है – वॉशिंगटन के दबाव और मॉस्को पर निर्भरता से निपटते हुए स्वायत्तता को बरकरार रखना।”

व्यापार संतुलन रूस के पक्ष में

रूस के साथ भारत का मर्चेंडाइज व्यापार बहुत ज्यादा असंतुलित है। आपसी व्यापार बढ़ने के बावजूद ट्रेड एकतरफा बना हुआ है। रूस को भारत हर साल मुश्किल से 5 अरब डॉलर का निर्यात करता है, जबकि ऊर्जा आयात में लगभग 64 अरब डॉलर का हिस्सा है। भारत से रूस को निर्यात 2023-24 के 4.3 अरब डॉलर से बढ़कर 2024-25 में 4.9 अरब डॉलर हुआ। इस साल अप्रैल-सितंबर 2025 में 2.25 अरब डॉलर का निर्यात हुआ है।

रूस को भारत का एक्सपोर्ट बास्केट छोटा है और इसमें कुछ इंडस्ट्रियल और केमिकल गुड्स ही मुख्य हैं। भारत से रूस को फार्मास्यूटिकल्स और मशीनरी का निर्यात तो मजबूत है, लेकिन गारमेंट, इलेक्ट्रॉनिक्स और कंज्यूमर गुड्स बहुत कम है। मौजूदा वित्त वर्ष की पहली छमाही में भारत ने मुख्य रूप से मशीनरी (36.78 करोड़ डॉलर), फार्मास्यूटिकल्स (24.6 करोड़ डॉलर) और ऑर्गेनिक केमिकल्स (16.58 करोड़ डॉलर) का निर्यात किया। कंज्यूमर कैटेगरी में तो मामूली निर्यात ही होता है। भारत ने स्मार्टफोन का 7.59 करोड़ डॉलर, वन्नामेई श्रिम्प का 7.57 करोड़ डॉलर, मीट का 6.3 करोड़ डॉलर और 2.09 करोड़ डॉलर के गारमेंट्स का निर्यात किया है।

आयात की बात करें तो 2023-24 में भारत ने रूस से 63.2 अरब डॉलर का आयात किया जो 2024-25 में थोड़ा बढ़कर 63.8 अरब डॉलर हो गया। अप्रैल-सितंबर 2025 में 31.2 अरब डॉलर का आयात हुआ है। इसमें पेट्रोलियम का दबदबा बहुत ज्यादा है। कच्चा तेल (23.1 अरब डॉलर) और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स (2.5 अरब डॉलर) सबसे आगे हैं, इसके बाद कोयला (1.9 अरब डॉलर) है। उर्वरक (1.3 अरब डॉलर) और सनफ्लावर सीड ऑयल (63.3 करोड़ डॉलर) का आयात भी अहम हैं। नॉन-एनर्जी आयात में हीरा (20.2 करोड़ डॉलर) प्रमुख है।

पुतिन के दौरे के संभावित नतीजे

श्रीवास्तव दो संभावित नतीजों की बात करते हैं। एक संभावित नतीजा आपसी रिश्तों को सावधानी से मजबूत करना है। भारत रक्षा क्षेत्र में डिलीवरी, मेंटनेंस कॉन्ट्रैक्ट और एयरक्राफ्ट, टैंक तथा पनडुब्बी के लिए टेक्नोलॉजी अपग्रेडेशन की टाइमलाइन सुनिश्चित कर सकता है। बदले में रूस लंबे समय के लिए एनर्जी कमिटमेंट कर सकता है। इसमें LNG फील्ड में भारतीय निवेश फिर से शुरू करना, दीर्घकालिक क्रूड सप्लाई एग्रीमेंट और न्यूक्लियर प्लांट के तेजी से कंस्ट्रक्शन शामिल हैं। दोनों देश दिरहम का इस्तेमाल करके एक नया पेमेंट फ्रेमवर्क भी बना सकते हैं। रूस के SPFS सिस्टम को भारत के RuPay नेटवर्क के साथ जोड़ा भी जा सकता है।

दूसरा संभावित नतीजा आपसी रिश्तों को और मजबूत बनाने का है। इसके तहत भारत और रूस रक्षा उपकरणों के साझा उत्पादन, आर्कटिक LNG 2 या वोस्तोक जैसे रूसी तेल और गैस प्रोजेक्ट्स में भारतीय निवेश और मौजूदा रिएक्टरों से आगे न्यूक्लियर कोऑपरेशन बढ़ाने पर सहमत हो सकते हैं। चेन्नई-व्लादिवोस्तोक कॉरिडोर या इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) की पहल भी तेजी पकड़ सकती हैं। रूस के पास पड़े भारतीय रुपये का बैलेंस कम करने के लिए एक स्ट्रक्चर्ड सेटलमेंट फ्रेमवर्क पेश किया जा सकता है। हालांकि इन कदमों पर पश्चिमी देशों की प्रतिक्रिया और तीखी हो सकती है।

रूस अब भी क्यों मायने रखता है

इतिहास भारत-रूस साझीदारी का गवाह है। शीत युद्ध के दौरान अमेरिका ने पाकिस्तान का साथ दिया और 1971 की लड़ाई के दौरान USS एंटरप्राइज को तैनात किया था। तब सोवियत संघ ने हथियारों से मदद करने के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र में भारत के समर्थन में खड़ा हुआ। मॉस्को 1962 में चीन के साथ लड़ाई के समय भी भारत के साथ खड़ा रहा। कश्मीर पर उसने बार-बार राजनयिक समर्थन दिया। वर्ष 1998 में भारत के परमाणु परीक्षण के बाद पश्चिमी देशों ने प्रतिबंध लगाया तो रूस भारत का रक्षा सहयोगी बना रहा। दशकों से रूस भारत को रणनीतिक टेक्नोलॉजी ट्रांसफर करता रहा है जिन्हें पश्चिमी देशों ने रोक रखा था। आज भी भारत के लगभग 60-70% मिलिट्री प्लेटफॉर्म रूसी मूल के हैं।

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